बिहार जहाँ की आबोहवा से बुद्ध के ज्ञान की खुशबू आती है, बिहार जहाँ की पावन माटी ने गुरुगोबिंद सिंह जैसे वीरों को जन्म दिया है ! अशोक जैसा महान शासक,चाणक्य जैसा नीतिवान और महावीर जैसे दार्शनिकों की कर्मस्थली रहा है बिहार ! बिहार के महान बेटों ने भारतवर्ष की शरहदों से बाहर जाकर सनातन धर्म की,और लोकतंत्र की स्थापना की है ! लुटियंस पेश करते है “भारतवर्ष का गौरव,बिहार का स्वर्णिम इतिहास”

Sunday, 31 January 2016

बिहार दर्शन

बिहार दर्शन

देर रात तक दुआओं का लेन-देन, देर सुबह तक की नींद, पूजा-पाठ, खास पकवानों का लुफ्त, दोस्तों-रिश्तेदारों से मेल मिलाप और पुनः ये सोचना कि कल “काम” पर भी जाना है ...

जी हाँ आगाज हो चूका है नये साल का ...

वैसे अगर पूछा जाए कि इस साल का आपका रीजोल्युसन क्या है तो जरुर काफी कुछ बता दिया जा सकता है ... कुछ मजाक में तो कुछ बहुत ही सीरियस हो कर बनाते हैं अपना नये साल का रीजोल्युसन... कुछ सच भी कर जाते हैं तो कुछ जल्द ही पुराने ढर्रे पर लौट आते हैं ... ये दुसरे तरह की प्रकृति ज्यादा ही पाई जाती है लोगों में ... ;)

Ok boss… that’s the Eve of New Year and yes 2016 is installed in your life with the validity of one year :P

Today on this eve, I want to launch my new Blog that will be based on “Bihar”.

A new way to see Bihar…

हम बिहार में रहते हैं पर हममें से कितने लोग हैं जो “घुमने” के नाम पर “बिहार भ्रमण” की इच्छा रखते हों... हममें से कितने हैं जो जानते हों जिन्होंने घुमा और महसूस किया हो बिहार में मौजूद विभिन्न जिलों की खासियत को... काफी कुछ ऐसा है बिहार में जो गूगल करने पर भी नहीं मिलता ... 

बिहार के इतिहास की बातें होती रहीं हैं , और शायद यही वजह है कि दुनिया हमें आज भी इतिहास की नजरों से ही देखती है ... हम यहाँ उन जगहों के प्रकृति और जीवनशैली को करीब से जानने की कोशिश करेंगे...

इसके लिए हमें निश्चित तौर पर हर जगह से लोगों के जुड़ने की आवश्यकता होगी ...

ये ब्लॉग सिर्फ मेरा नहीं हम सब का होगा , चाहे आप बिहार में रहते हों या बिहार से बाहर... हम चाहेंगे कि आप पूरी तरह से एक्टिविट हो कर जुड़ें इस से ...

अगर आप बिहार में हैं तो कहाँ से हैं, क्या मशहूर है वहाँ और ऐसा क्या है जिसे आप मशहूर करना चाहेंगे, जिसे आप उस जगह के पहचान के तौर पर देखते हों, जिसके बारे में आप अपने दोस्तों से कहते हों कि “यार यहाँ आये और ये न किया, ये न खाना, इस जगह को न घुमा तो क्या किया”
अगर आप बिहार से बाहर हैं तो क्या याद करते हैं अपनी धरती के बारे में , किस चीज़ को मिस करते हैं, किसके बारे में सोचते हैं की “ये चीज़ हमारे बिहार से अच्छी कहीं नहीं मिलती” किसके बारे में लोगों को बताते हैं कि “यार चलो बिहार तुम्हें दिखाते हैं हमारा स्टाइल क्या है”

वो सब कुछ जो आप सोचते हैं अपने जगह के बारे में ... मुझे बताईये,

बिहार को ले कर अपना अनुभव बताइए ... ताकि हम उसे पूरी दुनिया के सामने एक पटल पर रख सकें, जिसके बारे में सभी जानें ... जिसे याद कर के विदेशों में रह रहे हमारे बंधू दो पल को बिहार को याद कर के मुस्कुरा सकें ...

ये एक कोशिश है खुद को जानने की, अपने बंधुओं को ख़ुशी देने की, जिसे सफल बनाना अब बिहारियों, हमारे और आपके हाथ में है...

पहुंचाइये ये सूचना, ये ब्लॉग, अपने हर परिचित तक ...

साथ देंगे न मेरा ?

हम देखेंगे बिहार की कुछ ऐसी तस्वीरें जो अछूती हैं, जिन्हें कोई मीडिया हाईलाइट नहीं करता| आइये जीते हैं बिहार को ठेंठ बिहारीपन में | जुड़िये मुझसे, अपने घर से, अपने बिहार से |

आपके परिचित जो दूर हैं अपने गाँव-घर से उन्हें भी जोड़ने का प्रयत्न करें |

अपनी कविता की दो पंक्तियाँ आपको सौंपते हुए आग्रह करूंगी कि जानिए अपने बिहार को जरा और करीब से ...

गाँव-घर के देवल संस्कार कहाँ जाई

मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई ||

सोन भंडार गुफा ,राजगीर [बिहार]

सोन भंडार गुफा ,राजगीर [बिहार]

  
राजगीर बिहार में एक लोकप्रिय पर्यटक स्थल है,प्रकृति की सुन्दरता यहाँ देखते बनती है पांच तरफ से पहाड़ियों से घिरे इस क्षेत्र से बानगंगा बहती है .
कभी यहाँ  वैभवशाली महानगर हुआ करता था आज वहां एक छोटा गाँव भर है.राजगीर अपनी गुफाओं,किलों,बोद्ध और जैन मंदिरों के लिए जाना जाता है.वेणु विहार एक बहुत ही खूबसूरत स्थल है जिसे भगवान बुद्ध  को उस समय के राजा बिम्बीसार ने भेंट में दिया था.यहीं जापानी बुद्ध संघ ने विश्व शान्ति स्तूप भी बनवाया हुआ है.

हाल ही में उत्तर प्रदेश में स्वर्ण भण्डार के होने की चर्चाएँ खूब हुईं थीं खुदाए भी हुई और अब भी दावा किया जा रहा है की किसी अन्य स्थान पर भी भंडार हो सकता है,मैं नहीं जानित कितनी सच्चाई उन बातों में है लेकिन एक ऐसे खजाने के बारे में आज बताने जा रही हूँ जो बिहार की  एक गुफा में आज तक बंद है.यह स्थान नालंदा से कोई १२-१३ किलोमीटर दूर है.

 
सोन भण्डार गुफा किसी समय यह भिक्षुओं के रहने का उत्कृष्ट और भव्य स्थान हुआ करता था.
इस गुफा का ऐतिहासिक और पुरातत्व महत्व है.यह बिहार आने वाले पर्यटकों में लोकप्रिय है. 
निर्माण काल [तीसरी या चौथी सदी?] निश्चित नहीं है. 

सोन भण्डार गुफा  ,राजगीर [बिहार] 

बिहार राज्य के बारे में विस्तार से आप पहले की पोस्ट में पढ़ चुके हैं.आज इसी राज्य के राजगीर लिए चलते हैं.यह क्षेत्र नालंदा जिले में स्थित है और इस का ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व भी है.यहाँ भगवान्  बुद्ध ने कई साल बिताए थे. 

यह मगध की राजधानी थी और उस समय इस का नाम राजगृह था. यहीं पर भीम ने जरासंध का वध किया था.यहाँ के मकर और मलमास मेले भी बहुत प्रसिद्ध हैं. 

अग्नि पुराण एवं वायु पुराण आदि के अनुसार इस मलमास अवधि में सभी देवी देवता यहां आकर वास करते हैं. 
वैभर गिरी पहाड़ी के दक्षिण में बनी इस गुफा में दो कमरे हैं,एक मत अनुसार ये दो गुफाएं हैं.हम इन्हें एक गुफा के दो कमरे समझते हुए विवरण दे रहे हैं.ये दोनों कमरे पत्थर की एक चट्टान से बंद हैं. 

पहला कमरा सुरक्षा कर्मियों /गार्ड का कमरा माना जाता है.दूसरे कमरे में स्वर्ण भडार है जो की कुछ लोगों द्वारा राजा बिम्बिसार का खजाना बताया जाता है. 

अजातशत्रु के पिता बिम्बिसार की जेल के अवशेष पास ही मिले हैं जिससे इस मत को अधिक पुष्टि मिली है. जबकि कुछ अन्य लोगों का विश्वास है कि यह खजाना जरासंध का है. 

इस खजाने का दरवाजा आज तक कोई खोल नहीं पाया है ,गुफा की एक दीवार पर 'शंख लिपि में लिखा सीक्रेट कोड इस का पासवर्ड है.
खजाने के रहस्यमयी दरवाजे के ऊपर काला निशान दिखाई देगा जो कि तोप के गोले का है ,यह ब्रितानी हुकूमत में अंग्रेजी सरकार द्वारा इसे तोड़ने के प्रयास का एक प्रमाण है. 

पूर्वी गुफा कुछ नष्ट हो चुकी है.आगे का हिस्सा टूट चुका है.दक्षिणी दीवार पर ६ जैन तीर्थंकरों के चित्र भी खुदे हुए हैं.जो गुफा पूरी निर्मित होने के बाद अंकित किये गए माने जाते हैं. 

राजगीर बौद्ध धर्म का एक प्रसिद्ध तीर्थस्‍थल है. हिन्‍दू और जैन धर्म के कई मंदिर भी हैं.ज्ञात हो कि राजगीर के आस-पास की पहाडियों पर 26 जैन मंदिर बने हुए हैं.जहाँ पहुंचना आसान नहीं है. 

सोन गुफा के अतिरिक्त आप राजगीर में गृद्धकूट पहाड़ी, अजातशत्रु का किला-,पिप्‍पल गुफा[इसी गुफा में बौद्ध गुरु महाकश्‍यप कई बार ठहरे थे], वेणुवन, जीवककरम मठ, तपोधर्म, सप्‍तपर्णी गुफा, जरासंध का अखाड़ा, बिंबिसार का जेल, शांतिस्‍तूप,वैभव पहाड़ी के किनारे गर्म पानी का झरना आदि देख सकते हैं..

सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर

सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर

संसार में सबसे प्राचीन जीवंत हिन्दू मंदिर मुंडेश्वरी मंदिर माना जाता है साथ ही भारत में सबसे प्राचीन पूर्ण जीवंत हिन्दू मंदिर भी इसी मंदिर को मानते हैं.
 आकिर्योलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया ने माना है कि इतिहास के मद्देनजर यह भारत देश का सबसे पुराना मंदिर है.
भारत के पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग द्वारा संरक्षित इस मंदिर के पुरुत्थान के लिए योजनायें बन रही है.यूनेस्को की लिस्ट में भी शामिल करवाने के प्रयास जारी हैं.इस मंदिर के बारे में मैं यहाँ संक्षेप में जानकारी दे रही हूँ.
अधिक जानकारी आप इस की साईट पर जा कर भी ले सकते हैं.http://mundeshwarimandir.org/history.html 
मुंडेश्वरी देवी का यह मंदिर बिहार के कैमूर जिले के भगवानपुर अंचल में पवरा पहाड़ी पर 608 फीट की ऊंचाई पर स्थित है.
कैमूर जिले का नाम सुन कर आप को भी याद आ गया होगा जी हाँ ,यह वही कैमूर जिला है जहाँ हरशुब्रह्म धाम में हर साल चैत्र शुक्ल पक्ष के प्रारंभ होते ही नवरात्र के अवसर पर कथित तौर पर भूतों की अदालत लगती है और कुछ लोग कथित भूतों, डायनों और चुडैलों से मुक्ति दिलाते हैं.अब इस में क्या सच्चाई है हम नहीं जानते.
Picture is from wikipedia http://commons.wikimedia.org/wiki/File:Infomation_board_at_Mundeshwari_devi_temple.jpg
चलिए आप को इस देवी मंदिर के बारेमें बताते हैं .
स्थापना कब और किस ने करवाई -पुरातत्व विभाग को यहाँ ब्राह्मी लिपि में लिखित जो शिलालेख और श्रीलंका के महाराजा दुतगामनी की राजकीय मुद्रा मिली थीं. जिन पर किये ताज़ा पुरातात्विक शोधों के आधार पर इसे कुषाण युग में हुविश्क के शासनकाल में सन्‌ 108 ईस्वी में उत्कीर्ण माना जा रहा है.किस ने बनवाया यह ज्ञात नहीं है.
इस मंदिर के आस पास अवशेषों में कई अन्य भगवानो की मूर्तियाँ आदि भी मिली हैं.मुख्यत देवी मुंडेश्वरी की पूजा होती है.यहाँ शिव और पार्वती की पूजा होते रहने के भी प्रमाण मिले हैं.
कुछ और रोचक तथ्य -
१-यहाँ एक चतुर्मुखी शिवलिंग है ,कहते हैं इसका रंग सुबह, दोपहर और शाम में अलग अलग दिखता है.
२-यहाँ बकरे की बलि नहीं दी जाती बल्कि बकरे को देवी के सामने लाया जाता है.उसपर मन्त्र वाले चावल पुजारी छिडकता है जिस से वह बेहोश हो जाता है और फिर उसे बाहर छोड़ दिया जाता है.
३-सालों बाद यहां तांडुलम भोग [चावल का भोग] और वितरण की परंपरा पुन: शुरू हो गई है.माना जाता है कि 108 ईस्वी में यहां यह परंपरा जारी थी.
४- यहां का अष्टाकार गर्भगृह तब से अब तक कायम है.
५- जानकार मानते हैं कि उत्तर प्रदेश के कुशीनगर और नेपाल के कपिलवस्तु का रूट मुंडेश्वरी मंदिर से जुड़ा था.
६ -वैष्णो देवी की तर्ज पर इस मंदिर का विकास किये जाने की योजनायें राज्य सरकार ने बनाई हैं.
७-इस मंदिर का संरक्षक एक मुस्लिम है.
मुंडेश्वरी मंदिर की प्राचीनता का महत्व इस दृष्टि से और अधिक है कि यहां पर पूजा की परंपरा १९०० सालों से अविच्छिन्न रही है और आज भी यह मंदिर पूरी तरह जीवंत है.

नालंदा विश्वविद्यालय-[बिहार]

नालंदा विश्वविद्यालय-[बिहार]

बिहार का ऐतिहासिक नाम मगध है,बिहार का नाम 'बौद्ध विहारों'शब्द का विकृत रूप माना जाता है,इस की राजधानी पटना है जिसका पुराना नाम पाटलीपुत्र था.इस के उत्तर में नेपाल, पूर्व में पश्चिम बंगाल, पश्चिम में उत्तर प्रदेश और दक्षिण में झारखन्ड है.
इस राज्य की अधिकारिक साईट के अनुसार बिहार में ३८ जिले हैं.गंगा नदी यहाँ से गुजरती है.इस साईट में दिए विवरण के आधार पर भगवान राम की पत्नी देवी सीता यहीं की राजकुमारी थीं.सीतामढी के नाम से यहाँ एक जगह भी है.मह्रिषी वाल्मीकि भी यहीं हुए थे और वाल्मीकिनगर के नाम से वह जगह प्रसिद्द है.

इतिहास-
प्राचीन काल में मगध का साम्राज्य देश के सबसे शक्तिशाली साम्राज्यों में से एक था । यहां से मौर्य वंश, गुप्त वंश तथा अन्य कई राजवंशो ने देश के अधिकतर हिस्सों पर राज किया ।छठी और पांचवीं सदी इसापूर्व में यहां बौद्ध तथा जैन धर्मों का उद्भव हुआ । अशोक ने, बौद्ध धर्म के प्रचार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और उसने अपने पुत्र महेन्द्र को बौद्ध धर्म के प्रसार के लिए श्रीलंका भेजा । उसने उसे पाटलिपुत्र (वर्तमान पटना) के एक घाट से विदा किया जिसे महेन्द्र के नाम पर में अब भी महेन्द्रू घाट कहते हैं । बाद में बौद्ध धर्म चीन तथा उसके रास्ते जापान तक पहुंच गया .
बारहवीं सदी में बख्तियार खिलजी ने बिहार पर आधिपत्य जमा लिया। अकबर ने बिहार पर कब्जा करके बिहार का बंगाल में विलय कर दिया। इसके बाद बिहार की सत्ता की बागडोर बंगाल के नवाबों के हाथ में चली गई।
1912 में बंगाल विभाजन के फलस्वरूप बिहार नाम का राज्य अस्तित्व में आया । 1935 में उड़ीसा इससे अलग कर दिया गया .स्वतंत्रता के बाद बिहार का एक और विभाजन हुआ और सन् 2000 में झारखंड राज्य इससे अलग कर दिया गया.
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भारत देश में किसी समय शिक्षा के प्रमुख केन्द्रों में से एक माने जाने वाला राज्य आज देश के सबसे पिछड़े क्षेत्रों में से एक है.स्वंत्रता के पश्चात शैक्षणिक संस्थानों में राजनीति तथा अकर्मण्यता के प्रवेश करने से शिक्षा के स्तर में गिरावट आई है,यूँ तो हाल ही में यहाँ एक भारतीय प्रोद्योगिक संस्थान और पटना में एक राष्ट्रिय प्रोद्योगिक संस्थान खोला गया है .
बिहार में ऐतिहासिक और पोराणिक महत्व की इतनी जगहें हैं अगर इन्हें ठीक से प्रमोट किया जाये और यहाँ इन्हें देखने दिखाने की समुचित व्यवस्था हो तो बिहार भारत के प्रमुख पसंदीदा प्रयटक स्थलों में से एक हो जायेगा.
आज आप को एक ऐसे दर्शनीय जगह लिए चलते हैं जिसके बारे में बहुत लोग जानते हैं.-

बिहार में एक जिला है नालंदा...संस्कृत में नालंदा का अर्थ होता है “ज्ञान देने वाला” (नालम = कमल, जो ज्ञान का प्रतीक है; दा = देना).

यह स्थान पटना से ९० किलोमीटर और गया से ६२ किलोमीटर दूर है.यह विश्व में शिक्षा और संस्कृति के प्राचीनतम केन्द्र “नालंदा विश्वविद्यालय” के लिए प्रसिद्ध है. अब इस महानतम विश्वविद्यालय के सिर्फ़ खंडहर बचे हैं जो १४ हेक्टेयर क्षेत्र में फ़ैले हैं और यहीं है हमारे देश की एक अमूल्य धरोहर--जो सालों से लगभग उपेक्षित ही रही है.
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क्योंकि शिक्षा और ज्ञान-विज्ञान के प्रचीनतम केंद्र तथा विश्वविद्यालय के रूप में विश्वव्यापी ख्याति अर्जित करने वाले नालंदा के पुरावशेषों को यूनेस्को विश्व धरोहर बनाया जा सकता है. खबरों में तो है कि इस संबंध में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण एएसआई ने यूनेस्को को अपनी सिफारिश भेज दी है.
यूँ तो नालंदा पुरावशेष प्राचीन स्मारक एवं पुरातात्विक स्थल और पुरावशेष अधिनियम 1958 के तहत संरक्षित स्थल घोषित किया गया है. इस स्थान को नष्ट होने से बचाने के लिए मूल सामग्रियों के उपयोग से इसकी मरम्मत कराई गई है और इस दौरान इसके मूल स्वरूप को बरकरार रखा गया.
यूनेस्को के एक अधिकारी ने कहा कि नालंदा के पुरावशेष तथा दक्षिण पूर्वी एशिया में स्थित बौद्घ स्थलों में काफी समानताएं हैं. नालंदा स्थित मंदिर संख्या तीन का निर्माण पंचरत्न स्थापत्य कला से किया गया है. यह दक्षिण पूर्व एशिया के कई स्थलों के अलावा कंबोडिया के अंकोरवाट से मिलती जुलती है. उन्होंने कहा कि इसके अलावा नालंदा पुरावशेषों और तक्षशिला में भी काफी समानताएं हैं.
-हाल ही में पर्यटनमंत्रालय के अतुल्य भारत अभियान के साथ मिल कर एनडीटीवी द्वारा आयोजित एक राष्ट्रव्यापी सर्वेक्षण के तहत सूर्य मंदिर, मीनाक्षी मंदिर, खजुराहो, लाल किला, जैसलमेर दुर्ग, नालंदा विश्वविद्यालय और धौलावीर जैसे स्थलों को भारत के सात आश्चर्य के रूप में चुना गया है जो एक अच्छी खबर है.

-यह सभी जानते हैं कि पांचवीं सदी के विश्व प्रसिध्द नालंदा विश्वविद्यालय के नाम पर इस विश्वविद्यालय की स्थापना की जा रही है. नया नालंदा अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय बनाने के लिए भूतपूर्व राष्ट्रपति डॉ.ऐ.पी.जी.कलाम ने पहल की और अपने इस ड्रीम प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए उन्होंने दूसरे देशों से भी मदद स्वीकार की है.
बिहार सरकार ने पहले ही जमीन मुहैया करा दिया है।वह शुरुआती निवेश भी कर रही है। बिहार और केंद्र सरकार से कुछ शुरुआती कोष भी मिलने वाले है।खबर यह भी है कि ईस्ट एशिया समिट के 16 देश विश्वविद्यालय की स्थापना में आर्थिक सहायता दे रहे हैं.
इस मुद्दे पर एक समिति के साथ प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह से मुलाकात करने वाले नोबल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने कहा, ''यह संभवत: एक राष्ट्रीय के बजाय अंतर्राष्ट्रीय विश्वविद्यालय होगा जो प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की जगह स्थापित होगा।''उन्होंने कहा कि नालंदा हमारी सभ्यता का प्रतीक है और नालंदा का पुर्निर्माण एशिया के पुनर्जागरण के लिए महत्वपूर्ण है।
उनके अनुसार नालंदा विश्वविद्यालय में वर्ष 2010 तक शैक्षणिक सत्र की शुरुआत हो जाएगी.
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नालंदा विश्‍वविद्यालय सात शाताब्‍दियों तक एशिया के बौद्धिक जीवन का अंग था। यह विश्‍व के इतिहास में दर्ज पहले महान विश्‍वविद्यालयों में से एक था.
विश्‍व के प्राचीनतम विश्‍वविद्यालय के अवशेषों को आप बिहार के नालंदा जिले में देख सकते हैं.इसकी खोज अलेक्‍जेंडर कनिंघम ने की थी।भारतके इतिहास में जिसे 'गुप्तकाल' या 'सुवर्णयुग' के नाम से जाना जाता है, उस समय भारत ने साहित्य, कला और विज्ञान क्षेत्रों में अभूतपूर्व प्रगति की। उस समय मगध स्थित नालंदा विश्वविद्याल ज्ञानदान का प्रमुख और प्रसिद्ध केंद्र था।

कहते हैं कि इस की स्थापना ४७० ई./४५० ई.[?] में गुप्त साम्राज्य के राजा कुमारगुप्त ने की थी। यह विश्व के प्रथम पूर्णतः आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक था जहां १०,००० छात्र और २,००० शिक्षक रहते थे। यह विश्वविद्यालय स्थापत्य का एक शानदार नमूना था। आज भी इसके अवशेषों के बीच से होकर गुजरने पर आप इसके गौरवशाली अतीत को अनुभव कर सकते हैं। यहां कुल आठ परिसर और दस मन्दिर थे। इसके अलावा कई पूजाघर, झीलें, उद्यान और नौ मंजिल का एक विशाल पुस्तकालय भी था। नालंदा विश्वविद्यालय का पुस्तकालय बौद्ध ग्रन्थों का विश्व में सबसे बड़ा संग्रह था।इस विश्‍वविद्यालय को इसके बाद आने वाले सभी शासक वंशों का समर्थन मिला। महान शासक हर्षवर्द्धन ने भी इस विश्‍वविद्यालय को दान दिया था। हर्षवर्द्धन के बाद पाल शासकों का भी इसे संरक्षण मिला। केवल यहां के स्‍थानीय शासक वंशों ने ही नहीं वरन विदेशी शासकों से भी इसे दान मिला था।
नालंदा विश्वविद्यालय में विद्यार्थी विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा, तर्कशास्त्र, गणित, दर्शन, तथा हिन्दु और बौद्ध धर्मों का अध्ययन करते थे। चौथी से सातवीं ईसवी सदी के बीच नालंदा का उत्कर्ष हुआ।
नालंदा को राजाश्रय प्राप्त था। शकादित्य, बुद्धगुप्त, तथागत गुप्त, बालादित्य, वज्र और हर्ष ने यहाँ भवन बनवाये थे। हर्ष ने तो यहा भवन की प्राचीर और साधाराम बनवाया था।

अध्ययन करने के लिए चीन, जापान, कोरिया, तिब्बत, इंडोनेशिया, इरान और तुर्की आदि देशो से विद्यार्थी आते थे। प्रसिद्ध चीनी यात्री ह्वेन्सांग ने भी ईस्वी सन् ६२९ से ६४५ तक यहां अध्ययन किया था तथा अपनी यात्रा वृतान्तों में उसने इसका विस्तृत वर्णन किया है। सन् ६७२ ईस्वी में चीनी इत्सिंग ने यहाँ शिक्षा प्राप्त की।कहा जाता है कि नालंदा विश्वविध्यालय में चालीस हजार पांडुलिपियों सहित अन्य हजारों दुर्लभ हस्त लिखित पुस्तकें थी

खगोलशास्त्र के अध्ययन के लिए एक विशेष विभाग था। एक प्राचीन श्लोक के अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालय के कुलपति भी थे। आर्यभट के लिखे तीन ग्रंथों की जानकारी आज भी उपलब्ध है। दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र। लेकिन जानकारों के अनुसार उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था-'आर्यभट्ट सिद्धांत' .इस समय उसके केवल ३४ श्लोक ही उपलब्ध हैं। उनके इस ग्रंथ का सातवे शतक में व्यापक उपयोग होता था। लेकिन इतना उपयोगी ग्रंथ लुप्त कैसे हो गया इस विषय में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिलती।

यहाँ के तीन बड़े बड़े पुस्तकालय के नाम थे -:

1. रत्न सागर 2. विढ्ध्यासागर 3. ग्रंथागार 

११९३ में तुर्क मुस्लिम सेनापतिबख्तियार खिलज़ी ने बिहार पर आक्रमण किया। जब वह नालंदा पहुंचा तो उसने नालंदा विश्वविद्यालय के शिक्षकों से पूछा कि यहां पवित्र ग्रन्थ कुरान है या नहीं। जवाब नहीं में मिलने पर उसने नालंदा विश्वविद्यालय को तहस नहस कर दिया और पुस्तकालय में आग लगा दी। कहते हैं यह ६ माह तक जलती रही और आक्रांता इस अग्नि में नहाने का पानी गर्म करते थे.

ईरानी विद्वान मिन्हाज लिखता है कि कई विद्वान शिक्षकों को ज़िन्दा जला दिया गया और कईयों के सर काट लिये गए। इस घटना को कई विद्वानों द्वारा बौद्ध धर्म के पतन के एक कारण के रूप में देखा जाता है। कई विद्वान यह भी कहते हैं कि अनेक महत्वपूर्ण ग्रन्थों के नष्ट हो जाने से भारत आने वाले समय में विज्ञान, खगोलशास्त्र, चिकित्सा और गणित जैसे क्षेत्रों मे पिछड़ गया।

अवशेष क्या कहते हैं-14 हेक्‍टेयर क्षेत्र में इस विश्‍वविद्यालय के अवशेष देखने से मालूम होता है कि यह परिसर दक्षिण से उत्तर की ओर बना हुआ है.सभी भवनों का निर्माण लाल पत्थरों से हुआ था.वर्तमान में दो मंजिला इमारत देखी जा सकती हैं.प्रार्थना भवन में भगवन बुद्ध कि भग्नावस्था में मूर्ति भी देखी जा सकती है.मुख्य पहेली के चित्र में आप ने मंदिर-२ की दीवार देखी थी.कई स्तूप और उनपर भगवन बुद्ध की विभिन्न मुद्राओं में मूर्तियाँ देखी जा सकती हैं.

यह भी देखिये--:

१-नालन्‍दा पुरातत्‍वीय संग्रहालय-
यहीं परिसर की विपरीत दिशा में बने संग्रहालय में यहाँ कि खुदाई से प्राप्त तांबे की प्‍लेट, पत्‍थर पर खुदा अभिलेख, सिक्‍के, बर्त्तन तथा 12वीं सदी के चावल के जले हुए दाने रखे हुए हैं।

२-नव नालन्‍दा महाविहारयह एक नया शिक्षा संस्‍थान है। इसमें पाली साहित्‍य तथा बौद्ध धर्म की पढ़ाई तथा अनुसंधान होता है।
३-ह्वेनसांग मेमोरियल हॉल

यह नवर्निमित भवन चीन के महान तीर्थयात्री ह्वेनसांग की याद में बनवाया गया है। इसमें ह्वेनसांग से संबंधित वस्‍तुओं तथा उनकी मूर्ति देखी जा सकता है।
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इस जगह के आस पास भी घूमीये--:

१-गाँव सिलाव में प्रसिद्द मिठाई खाजा जरुर खाएं.
२-प्रसिद्द सूर्य मंदिर और झील देखने सूरजपुर जाना होगा.

कैसे जाएँ-वायु मार्ग -
यहाँ से ८९ किलोमीटर दूर नजदीकी हवाई अड्डा पटना का जयप्रकाश नारायण हवाई अड्डा है।

रेल मार्ग -
नालन्‍दा में स्टेशन है. लेकिन यहां का प्रमुख रेलवे स्‍टेश्‍ान राजगीर है। राजगीर जाने वाली सभी ट्रेने नालंदा होकर जाती है।

सड़क मार्ग -
नालंदा सड़क मार्ग द्वारा राजगीर (12 किमी), बोध-गया (110 किमी), गया (95 किमी), पटना (90 किमी), पावापुरी (26 किमी) तथा बिहार शरीफ (13 किमी) से अच्‍छी तरह जुड़ा हुआ है।