बिहार जहाँ की आबोहवा से बुद्ध के ज्ञान की खुशबू आती है, बिहार जहाँ की पावन माटी ने गुरुगोबिंद सिंह जैसे वीरों को जन्म दिया है ! अशोक जैसा महान शासक,चाणक्य जैसा नीतिवान और महावीर जैसे दार्शनिकों की कर्मस्थली रहा है बिहार ! बिहार के महान बेटों ने भारतवर्ष की शरहदों से बाहर जाकर सनातन धर्म की,और लोकतंत्र की स्थापना की है ! लुटियंस पेश करते है “भारतवर्ष का गौरव,बिहार का स्वर्णिम इतिहास”

Tuesday, 12 January 2016

चलिए न ! बिहार घूम आते हैं : मुंगेर

चलिए न ! बिहार घूम आते हैं : मुंगेर

 

वैसे तो पूरा बिहार अनोखा है..
हम आपको आज सबसे पहले पुरे बिहार से परिचित करा रहे हैं.. हर गली हर मोहल्ला हर लोग.. मड़ई से लेकर बिल्डिंग तक.. नदी से ले कर तालाब तक.. मंदिर से ले कर मस्जिद तक.. लिट्टी से लेकर चोखा तक…
और आप से लेकर मेरे तक..ANOKHA BIHAR

तो चलिए न ! बिहार घूम आते हैं..

आज का शहर मुंगेर

योग नगरी मुंगेर में आपका स्वागत है..

मुंगेर कई पहाड़ियों से धिरा हुआ नगर है। कर्णपुर की पहाड़ीमहाभारत के कर्ण से सम्बन्धित बताई जाती है। महाभारत के उपर्युक्त प्रसंग में भी कर्ण और भीम का युद्ध मुंगेर के उल्लेख से ठीक पूर्व वर्णित है।

स्थापना

भारत के प्राचीन अंग साम्राज्य बिहार का प्रमुख केन्द्र मुंगेर शहर एवं ज़िला है। मुंगेर ज़िले का प्रशासनिक मुख्यालय, बिहार राज्य, पूर्वोत्तर भारत, गंगा नदी पर स्थित है। कहा जाता है कि मुंगेर की स्थापना गुप्त शासकों ने चौथी शताब्दी में की थी। यहाँ एक क़िला है, जिसमें मुस्लिम संत शाह मुश्क नफ़ा जिनकी मृत्यु 1497 में हुई थी, की मज़ार है। 1793 में बंगाल के नवाब मीर क़ासिम ने मुंगेर को अपनी राजधानी बना कर यहाँ शस्त्रागार और कई महलों का निर्माण करवाया। 1864 में यहाँ नगरपालिका का गठन हुआ।

इतिहास

महाभारत में मुंगेर शहर को ‘मोदागिरि’ कहा गया है-‘अथ मोदागिरौ चैव राजानं बलवत्तरम् पांडवो बाहुवीर्येण निजधान महामृघे’[1] अर्थात् पूर्व दिशा की दिग्विजय यात्रा में मगधपहुँचने के उपरान्त मोदागिरि के अत्यन्त बलवान नरेश को भुजाबल से युद्ध में मार गिराया। इसका वर्णन गिरिव्रज (राजगीर) के पश्चात् है तथा इसके उल्लेख के पहलेभीम कीकर्ण पर विजय का वर्णन है। किंवदन्ती के अनुसार मुंगेर की नींव डालने वाला चंद्र नामक राजा था। नगर के निकट सीताकुण्ड नामक स्थान है। जहाँ कहा जाता है कि सीताअपने दूसरे वनवास काल में अग्नि प्रवेश के लिए उतरी थी। चंडी स्थान भी प्राचीन स्थल है। एक किंवदन्ती में मुंगेर का वास्तविक नाम मुनिगृह भी बताया जाता है। कहते हैं कि यहीं पहाड़ी पर मुदगल मुनि का निवास स्थान होने से ही यह स्थान मुदगल नगरी कहलाता था। किन्तु इसका सम्बन्ध महाभारत के मोदागिरि से जोड़ना अधिक समीचीन है।कनिंघम के मत में 7वीं शती में युवानच्वांग ने इस स्थान को लोहानिनिला (लावणनील) कहा है। 10वीं शती में पाल वंशी देवपाल का यहाँ पर राज था, जैसा कि उसके ताभ्राट्ट लेख में वर्णित है। मुंगेर में मुस्लिम बादशाहों ने भी काफ़ी समय तक अपना मुख्य प्रशासन केन्द्र बनाया था, जिसके फलस्वरूप यहाँ पर उस समय के कई अवशेष हैं। मुग़लों के समय का एक ज़िला भी उल्लेखनीय है। यह गंगा के तट पर बना है। इसके उत्तर पश्चिम के कोने में कष्टतारिणी नामक गंगा घाट है। जहाँ 10वीं शती का एक अभिलेख है। क़िले से आधा मील पर ‘मान पत्थर’ है, जो गंगा के अन्दर एक चट्टान है। कहा जाता है कि इस पर श्रीकृष्ण के पदचिह्न बने हैं। क़िले के पश्चिम की ओर मुल्ला सईद का मक़बरा है। ये अशरफ़ नाम से फ़ारसी में कविता लिखते थे और औरंगज़ेब की पुत्री जेबुन्निसाके काव्य गुरु भी थे। इनका मूल निवास स्थान कैस्पियन सागर के पास मजनदारन नामक स्थान था। अकबर के समय में टोडरमल ने बंगालके विद्रोहियों को दबाने के लिए अभियान का मुख्य केन्द्र मुंगेर में बनाया था। शाहजहाँ के पुत्र शाहशुजा ने उत्तराधिकार युद्ध के समय इस स्थान में दो बार शरण ली थी। कुछ विद्वानों का मत है कि मुंगेर का एक नाम ‘हिरण्यपर्वत‘ भी है, जो सातवीं शती या उसके निकटवर्ती काल में प्रचलित था।

पर्यटन

मुंगेर किला, मुंगेर

मुंगेर किला मुंगेर का सबसे आकर्षक पर्यटन स्थल है जिसका निर्माण गुलाम राजवंश के समय में हुआ था, हालाँकि इसके निर्माण की कोई निश्चित तिथि ज्ञात नहीं है। किले में दो प्रमुख पहाड़ियां हैं जिन्हें करनाचौरा कहा जाता है तथा दूसरा एक आयताकार टीला है जहाँ कभी एक गढ़ होता था तथा प्राचीन काल में यह एक महत्वपूर्ण केंद्र था।

इस किले पर कई शासकों ने राज्य किया जैसे तुगलक, खिलजी, लोधी, बंगाल के नवाब, मुगल शासक और अंत में ब्रिटिश। इसने किले की आत्मा पर एक अद्वितीय स्मृति उकेरी है। इस किले की सुंदरता इस तथ्य में है कि यहाँ ऐतिहासिक और धार्मिक स्मारक जैसे पीर शाह नूफा और मुल्ला मुहम्मद सैयद की कब्र हैं।

बिहार स्कूल ऑफ योग, मुंगेर

बिहार स्कूल ऑफ योग की स्थापना स्वामी सत्यानंद ने 1964 में की थी। यह स्कूल पूरे विश्व में योग के निर्देशों के लिए प्रसिद्ध है। इस स्कूल में योग तथा व्यक्तित्व को निखारने में योग का उपयोग सिखाया जाता है। यह सुंदर स्कूल गंगा नदी के किनारे स्थित है जहाँ पूरे विश्व से विद्यार्थी आते हैं जहाँ जाति, समुदाय और राष्ट्र के नाम पर किसी भी प्रकार का भेदभाव नहीं किया जाता।

योग सिखाने की संपूर्ण प्रणाली का उद्देश्य मानव जीवन के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक पहलुओं के बीच संतुलन स्थापित करना है। योग के लाभ सर्वज्ञात हैं अत: स्कूल का उद्देश्य बिहार स्कूल ऑफ योग में विकसित की गई योग की सूक्ष्म तकनीकों के माध्यम से जागरूकता प्रदान करना है।

ये तकनीक केवल बिहार तक ही सीमित नहीं है परंतु इसका उपयोग विभिन्न कॉलेजों, जेलों, अस्पतालों और अन्य कई संस्थाओं में किया जाता है। यह स्कूल अनेक संस्थाओं और मेडिकल शोध में योग का प्रशिक्षण भी देता है।

सीता कुंड, मुंगेर

सीता कुंड गर्म पानी का एक झरना है और ग्रिल्ड (चारों ओर जालियों से घिरा) है। पर्यटक पूरे वर्ष यहाँ की सैर करते हैं परन्तु माघ महीने की पूर्णिमा को इसका अलग महत्व होता है।

एक लोककथा के अनुसार जब सीता लपटों में से प्रकट हुई थी तब उन्होंने अपने शरीर की जलन बुझाने के लिए उन्होंने इस कुंड में स्नान किया।

यह स्थान इसलिए भी प्रसिद्ध है क्योंकि यहाँ राम कुंड स्थित है जो ठंडे पानी का झरना है तथा यह सीता कुंड के सामने स्थित है। पश्चिम दिशा में तीन जलाशय हैं जिनका नाम लक्ष्मण कुंड, शत्रुघ्न कुंड और भरत कुंड है जिनका नाम भगवान राम के तीन भाईयों के नाम पर पड़ा है।

कष्टहरणी घाट,

कष्टहरणी घाट का उल्लेख वाल्मीकि की रामायण में मिलता है जिसके अनुसार राक्षसी तारका को मारने के बाद भगवान राम अपने भाई लक्ष्मण के साथ कुछ समय के लिए यहाँ रुके थे। ऐसा भी कहा जाता है कि जब भगवान राम सीता के साथ विवाह करके मिथिला सेअयोध्या वापस लौट रहे थे तब उनके बहुत से साथी इस कष्टहरणी घाट पर स्नान करने के लिए रुके थे।

 

एक प्रसिद्ध विश्वास के अनुसार इस घाट में स्नान करने से सारे दर्द दूर हो जाते हैं तथा आपके मस्तिष्क, शरीर और आत्मा को शांति मिलती है। हालाँकि इस स्थान को धार्मिक महत्व प्राप्त नहीं हुआ है परंतु अपनी शाम बिताने के लिए यह एक अच्छा स्थान है तथा अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए पर्यटकों के बीच लोकप्रिय है।क्योंकि घाट का पानी उत्तर की ओर बहता है अत: इसे उत्तर वाहिनी गंगा भी कहा जाता है।

भीमबंद वन्य जीवन अभयारण्य

मुंगेर का भीमबंद वन्य जीवन अभयारण्य पूरे देश में वनस्पतियों और जीवजंतुओं की दुर्लभ प्रजातियों के लिए प्रसिद्ध है। यह मुंगेर के दक्षिण पश्चिम में खड़गपुर की पहाड़ियों पर स्थित है। इस अभयारण्य में चीता, जंगली भालू, नीलगाय, वन मुर्गी, सियार, पायथन और बार्किंग डियर जैसे जानवर पाए जाते हैं।

वनस्पतियों और जीव जंतुओं के संदर्भ में दो प्रकार के बायोम हैं: एक घास के मैदानों का बायोम तथा दूसरा जंगल बायोम। प्रवासी मौसम में यहाँ के दृश्य देखने लायक होते हैं जब मध्य एशिया क्षेत्र से बहुत बड़ी संख्या में पक्षी यहाँ आते हैं। भीमबंद अभयारण्य की सैर करने से भी नही चूकना चाहिए।

 

यातायात और परिवहन

जमालपुर तथा सिमलतला महत्त्वपूर्ण रेल और वाणिज्यिक केंन्द्र हैं।

कृषि और खनिज

चावल, मक्का, गेंहू, चना और तिलहन यहाँ की मुख्य फ़सलें हैं।

उद्योग व व्यवसाय

प्रमुख रेल, सड़क और स्टीमर संपर्क से जुड़ा यह स्थान एक महत्त्वपूर्ण अनाज मड़ी है। यहाँ उद्योगों में आग्नेययास्त्र व तलवार निर्माण और आबनूस का काम शामिल है। इस शहर में भारत के विशालतम सिगरेट कारख़ानों में से एक स्थित है। यहाँ अभरक, स्लेट और चूना पत्थर का खनन होता है।

शिक्षण संस्थान

यहाँ पर प्रसिद्ध योग विश्‍वविद्यालय है।

जनसंख्या

2001 की जनगणना के अनुसार इस ज़िले की कुल जनसंख्या 11,35,499 है व नगर की कुल जनसंख्या 1,87,311 है।

पर्यटन

मुंगेर में ऐतिहासिक क़िला है। यहाँ पर सीताकुंड नामक प्रमुख कुंड है। मुंगेर से 6 कि.मी. पूर्व में स्थित सीता कुंड मुंगेर आनेवाले पर्यटकों के आकर्षण का प्रमुख केंद्र है। इस कुंड का नाम पुरुषोत्‍तम राम की धर्मपत्‍नी सीता के नाम पर रखा गया है। कहा जाता है कि जब राम सीता को रावण के चंगुल से छुड़ाकर लाए थे तो उनको अपनी को पवित्रता साबित करने के लिए अग्नि परीक्षा देनी पड़ी थी। धर्मशास्‍त्रों के अनुसार अग्नि परीक्षा के बाद सीता माता ने जिस कुंड में स्‍नान किया था यह वही कुंड है। इस कुंड को बिहार राज्‍य पर्यटन मंत्रालय ने एक पर्यटक स्‍थल के रूप में विकसित किया है। इस कुंड को गर्म कुंड के नाम से भी जाना जाता है जिसका तापमान कभी-कभी 138° फॉरेनहाइट तक गर्म हो जाता है।

क्षेत्रफल

मुंगेर ज़िले का क्षेत्रफल 7,928 वर्ग किमी है और यह गंगा नदी के दक्षिण में फैले जलोढ़ मैदान में अवस्थित है। सुदूर दक्षिण में खड़गपुर की वनाच्छादित पहाड़ियां, जो की 490 मीटर ऊंची है, और यहीं पर छोटा नागपुर का पठार है।

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