बिहार दर्शन : भभुआ (कैमूर)
शुरुआत करते हैं दक्षिण-पश्चिम के कोने में अवस्थित “कैमूर” जिला से, जो घिरा है “कैमूर की पहाड़ियों” से|
स्वर्णा नदी पुल भभुआ
“कैमूर” जिसकी सीमा पश्चिम में उत्तर-प्रदेश के चंदौली जिला से मिलती है… शायद यही वजह है कि यहाँ की बोली (भोजपुरी) का टोन भी काफी हद तक बनारसी (यु.पी. वाला) है, आपको बताते चले की यहां खाटी बिहारी भोजपुरी भी बोली जाती है ।
GREEN CITY BHABHUA BIHAR, 821101
कैमूर का मुख्यालय है “भभुआ” (बताते चलूँ यही वो शहर है जिसे “ग्रीन सिटी” की संज्ञा मिली है … जी हाँ “ग्रीन सिटी”) |
नक्सलवाद से ग्रसित ये छोटा सा शहर आधुकनिकता को अपने अन्दर समेटता जा रहा है| सुन्दर सड़कें और बढ़ती इमारतें इस शहर का दायरा भी बढ़ा रही हैं|
यहाँ रिश्तेदारी में या किसी वजह से आयें हो और आप मुंडेश्वरी नहीं गये तो यहाँ आना सफल नहीं माना जाता| बिहार ( भारत के भी) प्राचीनतम मंदिरों में शामिल, 635 ई० पूर्व भी अवस्थित मुंडेश्वरी माँ का मंदिर जो भभुआ शहर से अलग-अलग रूट से लगभग 15-20 km की दूरी पर स्थित “भगवानपुर” ब्लॉक में मुण्डेश्वरी (पवरा पहाड़ी) पहाड़ी पर अवस्थित है और यहाँ तक आने के लिए आपको 500+ सीढियाँ चढ़नी होंगी जो आपको कमोवेश 608 फीट की ऊंचाई तक ले जाएँगी|
यह मंदिर जहाँ भारत के सबसे प्राचीन मंदिरों में शुमार किया जाता है, वहीं इस मंदिर की खूबियों में एक खूबी यह भी है कि शिव-शक्ति का मंदिर होते हुए भी यहाँ बलि का रक्त स्वीकृत नहीं होता| जिसका अर्थ यह है कि आपको यहाँ किसी बलि वाले पशु के खून का एक बूंद भी देखने नहीं मिलेगा| बलि चढ़ाते समय पंडितों के मंत्रोच्चार से पशु मूर्क्षित हो जाता है और पुनः मंत्रोच्चार से वह चैतन्य अवस्था में आ जाता है|
20 साल पहले तक जहाँ जाने का पक्का रास्ता तक नहीं था आज उस रास्ते पर पूरी सुगमता और सुरक्षा नजर आती है| रास्ते में कई जगह नल लगे हैं, जरूरत की छोटी-मोटी चीजें आसानी से उपलब्ध हो जाती हैं, धूप से बचाव के लिए सीढियों पर छज्जी भी बनाई जा चुकी है|
आप चाहें तो मोटरगाडियों से जाने के लिए रोड का सुगम रास्ता भी अपना सकते हैं लेकिन माँ के दरबार तक जाने के लिए अंत की 50 सीढियाँ चढ़ना तो अनिवार्य है|
धार्मिक, ऐतिहासिक और भौगोलिक रूप से समृद्ध और महत्वपूर्ण यह षट्कोणीय मंदिर भगवान् शिव और शक्ति (वराही देवी जो दक्षिण दिशा की स्वामिनी हैं) की उपासना का अदभुत स्थान है | यह मंदिर अपने अनुपम एवं दिव्य सांस्कृतिक धरोहरों, भग्नावशेषों में अतीत की अनेक गौरवशाली रहस्यपूर्ण एवं जीवंत स्मृतियाँ सहेजे हुए है|
माँ मुंडेश्वरी का सिद्धपीठ जहाँ भक्तों को बुलाता है वहीं पास में स्थित “तेल्हाड़ कुंड” रोमांचित साहसी पर्यटकों को लुभात है।
तेलहर कुण्ड
लेकिन यहाँ सिर्फ यही नहीं …
माँ चंडेश्वरी और हर्शुब्रह्म का धाम भी है जहाँ तंत्र विद्या से सम्बंधित क्रियाकलाप होते रहते हैं | वहीं बख्तियार खान का मकबरा भी है जहाँ 30 मजारें हैं|
“मोहनिया” से भभुआ रोड में आने वाला “लिक्ष्वीभवन” निश्चित तौर पर आकर्षित करता है| मकर-संक्रांति में लगने वाला “खलासपुर का मेला” ग्रामीण इलाकों में आज भी मशहूर है| शहर के शिक्षण व्यवस्था को संभालते सरदार वल्लभभाई पटेल महाविद्द्यालय, भूपेंद्र सिंह महाविद्यालय तथा महिला महाविद्द्यालय, आरा के वीर कुंवर सिंह विश्वविद्यालय के अभिन्न अंग हैं|
इन सब जगहों को घूम कर जब आप वापस अपने होटल (आवास) को जाते हैं तो यहाँ का लौंगलत्ता और स्पेशल कुल्फी खाना न भूलें …
कुल्फी
जी हाँ … ये कुल्फी स्पेशल ही तो है… जो बनाई जाती आ रही है पुरानी विधियों से … आज भी है शुद्ध और पूरी तरह से देसी … जरुर लुफ्त उठाइए
अफ़सोस होता है जब देखते हैं कि प्राकृतिक रूप से समृद्ध होते हुए भी पर्यटकों की संख्या अस्वभाविक रूप से कम है … बेहद कम
(अगर मैं कुछ छोड़ रहा हूँ तो कृपया इंगित करें… सुधार और अन्य महत्वपूर्ण तथ्य शामिल करने के लिए हमेशा तैयार हैं हम… धन्यवाद !!)
भभुआ की कुछ ख़ाश तस्वीरें
भभुआ रोड रेलवे स्टेशन
उफ़ ठण्ड
भभुआ शहर : पटेल चौक से एकता चौक की और जाता मार्ग
शहर का सबसे बड़ा मंदिर: महावीर स्थान
ग्रीन सिटी भभुआ एकता चौक
हरियली को समेटते हुए ग्रीन सिटी भभुआ
जिला कार्यालय भभुआ
GREEN CITY BHABHUA BIHAR, 821101
हम देखेंगे बिहार की कुछ ऐसी तस्वीरें जो अछूती हैं, जिन्हें कोई मीडिया हाईलाइट नहीं करता| आइये जीते हैं बिहार को ठेंठ बिहारीपन में | जुड़िये हमसे, अपने घर से, अपने बिहार से |
आपके परिचित जो दूर हैं अपने गाँव-घर से उन्हें भी जोड़ने का प्रयत्न करें |
अपनी कविता की दो पंक्तियाँ आपको सौपते हुए आग्रह करूंगे कि जानिए अपने बिहार को जरा और पास से …
गाँव-घर के देवल संस्कार कहाँ जाई
मनवा में बसल ई बिहार कहाँ जाई ||
जय बिहार जय हिन्द














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