बिहार के गांवों में आज भी बसता है नालंदा

बिहार का गौरवशाली शैक्षणिक अतीत रहा है। मगध काल में नालंदा विश्वस्तरीय पठन-पाठन केंद्र के रूप में विख्यात था। यहां विश्व के कोने-कोने से छात्र उच्च शिक्षा के लिए आते थे। लेकिन समय के साथ-साथ नालंदा का गौरवशाली इतिहास खंडहरों में तब्दील हो गया। कहा जाता है कि जब बख्तियार खिलजी की सेना ने आक्रमण कर इस विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में आग लगाई तो किताबें महीनों तक जलती रहीं।
इतना गौरवशाली इतिहास होने के बावजूद साक्षरता के लिहाज से बिहार आज देश के सबसे पिछड़े राज्यों में शुमार है। बिहार में प्रारंभिक स्कूली शिक्षा की दिशा तो ठीक हुई है लेकिन दशा अभी भी जस की तस है। प्रशिक्षित शिक्षकों और स्कूल-भवन संबंधी बुनियादी जरूरतों का अभाव सबसे बड़ी रुकावट है।
पिछले एक दशक में बिहार में साक्षरता वृद्धि दर 17 प्रतिशत होना एक शुभ संकेतक है। हालांकि इसके बावजूद साक्षरता दर 63.8 फीसदी ही पहुंच पाई है। यह देश के अन्य राज्यों की तुलना में सबसे कम है।
लेकिन इसके बावजूद बिहार के छात्रों ने अपना लोहा मनवाया है। चाहे बोर्ड की परीक्षा हो, सिविल सर्विसेज हो या देश के सर्वोच्च इंजीनियरिंग संस्थान आईआईटी या कोई अन्य प्रतियोगी परीक्षा, बिहार के स्टूडेंट्स हमेशा छाए रहते हैं।
फिर भी बिहार के छात्रों की योग्यता पर हमेशा ही सवालिया निशान लगते रहे हैं। खास तौर पर 10वीं या 12वीं के बाद राज्य के बाहर अन्य संस्थानों में एडमिशन लेने के दौरान उन्हें ताने सहने पड़ते हैं। इसकी एक वजह यह है कि बिहार नकल के लिए कुख्यात रहा है। ऐसी अवधारणा बनी है कि बिहार में धड़ल्ले से नकल होती है।
ये इस परीक्षा सत्र के दौरान मीडिया में छाई कुछ तस्वीरों से स्पष्ट होता है। अभी थोड़े ही समय पहले, 10वीं की बोर्ड परीक्षा में सामूहिक नकल की तस्वीर ने बिहार की शिक्षा व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़े किए थे। वहीं, आईआईटी के नतीजे आने के बाद बिहार की शिक्षा का एक दूसरा पहलू भी सामने है।
रिजल्ट देखकर नहीं लगता कि बिहार में टैलेंट की कमी है या वहां के छात्र नकल से पास होते हैं। गया स्थित बुनकरों के एक गांव से 18 बच्चे आईआईटी में प्रवेश पाने में सफल हुए हैं। पहली बार इस गांव से एक लड़की भी आईआईटी की परीक्षा में सफल हुई है। 10 हजार लोगों के इस गांव में ज्यादातर घरों में हथकरघा का काम होता है। शोर और विपरीत परिस्थितियों के बीच इन बच्चों ने जबरदस्त लगन और मेहनत से ये मुकाम हासिल किया है।
तो फिर कमी कहां है? ब्रांड तो अच्छा है, क्या सही मार्केटिंग नहीं हो रही? ऐसा भी नहीं है। कई गांवों में स्कूल के अध्यापक को देश के राष्ट्रपति का नाम नहीं मालुम। यह भी एक पहलू है। इसका बड़ा कारण ठेके पर अयोग्य शिक्षकों की भर्ती भी है। शिक्षा मित्रों को भी बेसिक जानकारी नहीं है। फिर नौनिहालों को वो क्या सिखाएंगे? इससे तो यही पता चलता है कि टैलेंट की कमी नहीं बस अच्छी शिक्षा व्यवस्था की जरूरत है। अभी जो छात्र सफल हुए हैं वो उनकी मेहनत का फल है।
अगर राज्य सरकार इस बाबत ध्यान दे तो वो समय दूर नहीं जब बिहार देश के सबसे शिक्षित राज्यों में शुमार होगा। यही नहीं, टैलेंट की खान इस राज्य का भविष्य भी इन होनहार छात्रों के माध्यम से ही संवर पाएगा।
जरूरत है तबीयत से एक पत्थर उछालने की। हां जिम्मेदारी उन सफल छात्रों की भी है जो अपने टैलेंट के बूते आगे निकल गए हैं। उन्हें भी राज्य के शिक्षा स्तर को सुधारने में योगदान देना होगा।
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