बिहार जहाँ की आबोहवा से बुद्ध के ज्ञान की खुशबू आती है, बिहार जहाँ की पावन माटी ने गुरुगोबिंद सिंह जैसे वीरों को जन्म दिया है ! अशोक जैसा महान शासक,चाणक्य जैसा नीतिवान और महावीर जैसे दार्शनिकों की कर्मस्थली रहा है बिहार ! बिहार के महान बेटों ने भारतवर्ष की शरहदों से बाहर जाकर सनातन धर्म की,और लोकतंत्र की स्थापना की है ! लुटियंस पेश करते है “भारतवर्ष का गौरव,बिहार का स्वर्णिम इतिहास”

Wednesday, 13 January 2016

पर्वत भी नतमस्तक

पर्वत भी नतमस्तक

पर्वत पुरूष दशरथ मांझी ने एक हथौड़ी-छैनी
की मदद से उस पहाड़ को खोदकर रास्ता
बना दिया। जिसे पार करने की कोशिश में
उसकी पत्नी गिर गयी थी। पर्वत पुरूष ने
पहाड़ के सीने को हथौड़ी-छैनी से लगातार
वार करके रास्ता बना डाला।

यह कहानी है दशरथ मांझी नाम के एक गरीब
आदमी की.
दशरथ मांझी का जन्म १९३४ में बिहार के
गेलहर गॉंव में एक बहुत गरीब परिवार में हुआ.
वे बिहार के
आदिवासी जनजाति में के बहुत निम्न
स्तरीय मुसाहर जनजाति से है. उनकी पत्नी
का नाम
था फाल्गुनी देवी. दशरथ मांझी के लिए
पीने का पानी ले जाते फाल्गुनी देवी
दुर्घटना की शिकार हुई. उसे
तुरंत डॉक्टरी सहायता नहीं मिल पाई. शहर
उनके गॉंव से ७० किलोमीटर दूर था. वहॉं सब
सुविधाए थी.
लेकिन वहॉं तक तुरंत पहुँचना संभव नहीं था.
दुर्भाग्य से वैद्यकीय उपचार के अभाव में
फाल्गुनी देवी की मौत हो गई. ऐसा प्रसंग
किसी और पर न गुजरे, इस विचार ने दशरथ
मांझी को पछाड़ा. समीप के शहर की ७०
किलोमीटर की दूरी कैसे पाटी जा सकती
है इस दिशा में
उनका विचार चक्र चलने लगा. उनके ध्यान में
आया कि, शहर से गॉंव को अलग करने वाला
पर्वत
हटाया गया तो यह दूरी बहुत कम हो
जाएगी. पर्वत तोडने के बाद शहर से गॉंव तक
की सत्तर
किलोमीटर दूरी केवल सात किलोमीटर रह
जाती. उन्होंने यह काम शुरू करने का दृढ
निश्चय किया.
लेकिन काम आसान नहीं था. इसके लिए उन्हें
उनका रोजी-रोटी देने का दैनंदिन काम
छोडना पड़ता.
उन्होंने अपनी बकरियॉं बेचकर छन्नी, हतोड़ा
और फावडा खरीदा. अपनी झोपडी काम के
स्थान के पास
बनाई. इससे अब वे दिन-रात काम कर सकते थे.
इस काम से उनके परिवार को दुविधाओं
का सामना करना पड़ा, कई बार दशरथ को
खाली पेट ही काम करना पड़ा. उनके आस-
पास से
लोगों का आना-जाना शुरू था. गॉंव में इस
काम की चर्चा हो रही थी. सब लोगों ने
दशरथ को पागल मान
लिया था. उन्हें गॉंव के लोगों की तीव्र
आलोचना सहनी पडती थी. लेकिन वे कभी
भी अपने निश्चय से
नहीं डिगे. जैसे-जैसे काम में प्रगति होती
उनका निश्चिय भी पक्का होता जाता.
लगातार बाईस वर्ष
दिन-रात किए परिश्रम के कारण १९६० में शुरु
किया यह असंभव लगने वाला काम १९८२ में
पूरा हुआ.

उनके अकेले के परिश्रम ने अजिंक्य लगने वाला
पर्वत तोडकर ३६० फुट लंबा, २५ फुट ऊँचा और
३० फुट
चौडा रास्ता बनाया. इससे गया जिले में के
आटरी और वझीरगंज इन दो गॉंवों में का
अंतर दस किलोमीटर
से भी कम रह गया.
उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी – जिसकी
प्रेरणा से उन्होंने यह असंभव लगने वाला काम
पूरा किया, उस
समय उनके पास नहीं थी. लेकिन, गॉंव के
लोगों से जैसे बन पड़ा, उन्होंने मिठाई, फल
दशरथ
जी को लाकर दिए और उनके साथ उनकी
सफलता की खुशी मनाई. युवक भी चॉंव से
इस पर्वत
को हिलाने वाले देवदूत की कहानी सुनने लगे
है. गॉंव वालों ने दशरथ जी को ‘साधुजी’
पदवी दी है.
दशरथ जी कहते है, ‘‘मेरे काम की प्रथम प्रेरणा
है मेरा पत्नी पर का प्रेम. उस प्रेम ने ही पर्वत
तोडकर रास्ता बनाने की ज्योत मेरे हृदय में
जलाई. करीब के हजारों लोग अपनी दैनंदिन
आवश्यकताओं
के लिए बिना कष्ट किए समीप के शहर जा
सकेगे, यह मेरी आँखो के सामने आने वाला
दृष्य मुझे दैनंदिन
कार्य के लिए प्रेरणा देता था. इस कारण
ही मैं चिंता और भय को मात दे सका.’’

* पहाड़ को चीर रास्ता बनाने
वाले ‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी की
बायोपिक में होंगे नवाजुद्दीन
सिद्दिकी..

‘माउंटेन मैन’ दशरथ मांझी के नाम पर बन रही
फिल्म इसी साल अगस्त में रिलीज हुई है
दशरथ मांझी की इस बायोपिक मूवी में
‘माउंटेन मैन’ का किरदार निभाया है
नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने. दरअसल, यह फिल्म
दो साल पहले की बनकर तैयार हो गई थी.
बाद में कानूनी पचड़े की वजह से यह रिलीज
नहीं हो पाई.
केतन मेहता ने इस फिल्म का निर्देशन किया
है. दो साल पहले जब फिल्म रिलीज का वक्त
आया तो धनंजय कपूर ने केतन मेहता पर मुकदमा
ठोक दिया. धनंजय का दावा था कि वे
इस फिल्म को बनाने वाले हैं. हालांकि,
अदालत ने धनजंय की इस दलील को गलत
बताया. ऐसे में अब जाकर यह फिल्म सिल्वर
स्क्रीन पर धमाल मचाने को तैयार है.
कौन थे ‘माउंटेन मैन’? गौरतलब है कि माउंटेन
मैन यानी दशरथ मांझी ने अपने अकेले हाथों
पहाड़ काट कर गांव के लिए सड़क बनाई थी.
दिन-रात काम कर उन्होंने 360 फुट लंबा और
30 फुट चौड़ा रास्ता तैयार किया था.
दरअसल, दशरथ मांझी के लिए पीने का पानी
ले जाते उनकी पत्नी फाल्गुनी देवी दुर्घटना
की शिकार हो गईं. उन्हें तुरंत डॉक्टरी
सहायता नहीं मिल पाई. शहर उनके गांव से
70 किलोमीटर दूर था. वहां सब सुविधाएं
थी, लेकिन वहां तुरंत पहुंचना संभव नहीं था.
दुर्भाग्य से इलाज के अभाव में फाल्गुनी देवी
की मौत हो गई. ऐसा हादसा किसी और
पर न गुजरे, इसलिए दशरथ मांझी ने लगातार
22 वर्ष दिन-रात किए परिश्रम से पर्वत
तोड़कर 360 फुट लंबा, 25 फुट ऊंचा और 30
फुट चौड़ा रास्ता बनाया.
इससे गया जिले के अतरी और वजीरगंज के इन
दो गांवों के बीच का फासला 

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