कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया !!
भोजपुरी में औरतों द्वारा ख़ुशी के मौके पर जोड़े या समूह में गाए जाने वाले झूमर गीतों की सदियों पुरानी परंपरा रही है। अब गांवों में भी फ़िल्मी गीतों के प्रचलन के साथ झूमर की गायन परंपरा लगभग लुप्त हो चुकी है। हमारी पीढ़ी के लोग बचपन में मां-बहनों-भाभियों को झूमर गाते देखते हुए ही बड़े हुए हैं। कई झूमर मुझे अब भी याद हैं, लेकिन जो एक गीत मुझे सबसे ज्यादा पसंद था, वह है - कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया, कवन रंग ननदी तोर भैया।' एक सदी से यह गीत भोजपुरी के सर्वाधिक लोकप्रिय गीतों में एक रहा है। 1959 की एक हिंदी फिल्म 'हीरा मोती' में संगीतकार रोशन ने चक्की चलाती ननद और भौजाई के मुंह से गवाकर इस गीत को देशव्यापी लोकप्रियता दिलाई थी। गीतकार के रूप में प्रेम धवन का नाम देखकर मुझे आश्चर्य हुआ। बीसवी सदी के आरंभ में इस गीत को बनारस के रहने वाले एक भोजपुरी कवि दिमाग राम ने लिखी थी। संवाद शैली में लिखे गए इस गीत में ननद और भाभी के हास-परिहास का रंग इतना आत्मीय और मासूम था कि यह गीत देखते-देखते समूचे भोजपुरी क्षेत्र में फ़ैल गया। यह गीत उनके नाम से एक बहुत पुरानी किताब 'झूमर तरंग' में संकलित है। दिमाग राम जी को नमन करते हुए आपके साथ इस पूरे गीत को साझा कर रहा हूं।
कवन रंग मुंगवा, कवन रंग मोतिया,
कवन रंग हे ननदी तोर भैया।
लाल रंग मुंगवा, सफ़ेद रंग मोतिया,
सांवर रंग हे भौजी मोरा भैया।
कान सोभे मोतिया, गले सोभे मुंगवा,
पलंग सोभे हे ननदी तोर भैया।
टूटी जैहे मोतिया, छितराई जैहे मुंगवा,
कि रूसि जैहे हे भौजी मोरा भैया।
चुनी लेबो मोतिया, बटोरि लेंबो मुंगवा,
मनाई लेबो हे ननदी तोर भैया।
वाया- BIHAR
प्रेम से बोलो जय बिहार
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